व्यासपीठ पर बैठने वाले कथावाचक मोरारी बापू, देवी चित्रलेखा तथा चिन्मयानन्द बापू आचार्य हैं या इस्लामाचार्य मौलाना? किसने दिया इन्हें व्यास पीठ पर बैठ अल्ला मौला जपने का अधिकार?

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आज मैं बात करूंगा सनातन की पावन तथा सर्वपूज्य व्यासपीठ पर बैठने वाले उन कथावाचकों के बारे में जो कहने को तो आचार्य हैं लेकिन पावन व्यासपीठ पर बैठकर ये आचार्यगण इस तरह के उपदेश दे रहे हैं, इस तरह की कथाएं कर रहे हैं, इस तरह के भजन गा रहे हैं जैसे ये कोई सनातनी आचार्य नहीं बल्कि इस्लामाचार्य मौलवी या मौलाना हों?
आप सभी को ज्ञात ही होगा कि पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें हमारे तमाम सनातनी कथावाचक पावन व्यास पीठ पर बैठकर इस्लामिक गाथाएं गए रहे हैं. ये सब कोई छोटे मोटे कथावाचक द्वारा नहीं किया जा रहा हैं बल्कि उन कथावाचकों द्वारा किया जा रहा है जिनके अनुयाईयों की संख्या लाखों ही नहीं करोड़ों में हैं तथा वह समाज के बीच सम्माननीय भी हैं. लेकिन इसके बाद भी ये कथावाचक आचार्य नहीं एक तरह से इस्लामचार्य मौलाना या मौलवी बनकर सनातनी लोगों अल्ला मौला के भजन सुना रहे हैं या सीधे शब्दों में कहें तो उन्हें पथभ्रमित कर रहे हैं.
ये वीडियोस विश्व विख्यात राम कथावाचक मोरारी बापू, श्रीमद्भागवत कथावाचक देवी चित्रलेखा ही, श्रीमद्भागवत कथावाचक चिन्मयानंद बापू आदि के हैं. ये वो लोग वो श्रीमद्भागवत कथा के समय अजान की आवाज सुनकर कथा को रोक देते हैं, स्वयं अजान पढ़ने लगते हैं तथा श्रोताओं को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते हैं. कथा के दौरान मौला मेरे अल्ला मेरे जैसे गीत गाने लगते हैं.  मेरा सीधा सवाल यहीं खड़ा होता है कि आखिर व्यासपीठ पर बैठने वाले ये कथावाचक वास्तव में सनातनी आचार्य हैं या इस्लामचार्य मौलाना मौलवी?  आखिर इन कथावाचकों को पावन व्यास पीठ पर बैठकर गैर सनातनी तथा दुसरे मजहब की बातें करने का, गुणगान करने का अधिकार किसने दिया?
सनातन में व्यास पीठ का काफी सम्मान किया जाता है, व्यास पीठ काफी पूज्य मानी जाती है. व्यास पीठ पर बैठे आचार्य की हर बात सनातनी लोगों के लिए आदेश के सामान होती है, ये जानने के बाद भी मोरारी बापू, देवी चित्रलेखा जी तथा चिन्मयानन्द बापू जैसे कथावाचक आखिर क्यों अपनी कथाओं में अल्ला मेरे मौला मेरे जैसे गीत गा रहे हैं? आखिर ये लोग अजान की आवाज सुनते ही कथा को रोक दे रहे हैं तथा श्रीराम कथा, श्रीमद्भागवत कथा सुनने के लिए आये सनातनी भक्तों को अजान पढ़ने का उपदेश दे रहे हैं आखिर क्यों?
पूज्य मोरारी बापू जी! जो श्रीराम कथा मर्मज्ञ माने जाते हैं, मोरारी बापू की कथा को सुनने वालों की संख्या करोड़ों में हैं, उसके बाद भी आखिर मोरारी बापू के सर पर आचार्य से इस्लामचार्य मौलाना बनने का भूत क्यों चढ़ा है? मोरारी बापू की कथा में लोग सनातन के आराध्य, हिंदुस्तान की पहिचान मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की कथा सुनने के लिए आते हैं, प्रभु श्रीराम के आदर्शों को जानने, सुनने तथा समझने के लिए आते हैं लेकिन मोरारी बापू उन्हें क्या सुनाते हैं ” अल्ला मेरे मौला मेरे अल्ला मेरे मौला मेरे”. आखिर हो क्या गया है मोरारी बापू को? क्या मोरारी बापू के लिए तारणहार भजन “श्रीराम जय राम जय जय राम” से बढ़कर अल्ला मेरे मौला मेरे, “मौला रे मौला—-मौला अली मौला-हरि मौला” हो गया है? पूज्य मोरारी बापू जी! ये सवाल सिर्फ मेरा नहीं है बल्कि हिंदुस्तान के साथ ही पूरी दुनिया में रहने वाले हर उस इंसान का है जो सनातनी है, जो भगवा ध्वज का सवाहक है, जो प्रभु श्रीराम का भक्त है तथा इसका जवाब आपको देना ही होगा पूज्य बापू जी आपको देना ही होगा।

अब बात करते हैं देवी चित्रलेखा तथा चिन्मयानंद बापू के बारे में. ये दोनों भी विख्यात कथावाचक हैं. चिन्मयानन्द बापू की कथा सुनने भारी संख्या में लोग इस उद्देश्य से आते हैं कि वहां श्रीमद्भागवत महापुराण का प्रसाद मिलेगा लेकिन बापू जी श्रोताओं को ये प्रसाद दें या न दें, अल्ला मेरे मौला मेरे, रसूलल्लाह मेरे अल्लाह का प्रसाद जरूर देते हैं. चिन्मयानन्द जी! आप अपने नाम के आगे बापू लगाते हो, सनातन की पूज्य व्यास पीठ पर बैठकर खुद को आचार्य कहलवाते हो लेकिन उस पीठ से इस्लामचार्य मौलाना ाका किरदार निभाते हुए आपको जरा भी शर्म नहीं आती.
वहीं देवी चित्रलेखा भी इन्हीं की राह पर हैं. इनका वीडियो है जिसमें ये श्रीमद्भागवत कथा कर रही हैं. पांडाल में हजारों की संख्या में श्रोता तारणहार श्रीमद्भागवत कथा को सुनने के लिए उपस्थित हैं. तभी अचानक से अजान की आवाज आती है तथा देवी चित्रलेखा जी अजान की आवाज सुनते ही कथा बंद कर देती हैं तथा श्रोताओं से कहती हैं कि अब 5 मिनट के लिए कथा को बंद कर अल्लाह को याद करें। यहां मैं आपत्ति अजान पर नहीं बल्कि देवी चित्रलेखा की इस सोच जता रहा हूँ कि आखिर अजान की आवाज सुनते ही देवी चित्रलेखा ने श्रीमद्भागवत कथा क्यों रोकी? क्या ये पूज्य व्यासपीठ तथा श्रीमद्भागवत कथा का अपमान नहीं है?
देवी चित्रलेखा जी! मैं आपसे पूंछना चाहता हूँ कि जिस तरह आपने अजान की आवाज सुनते ही कथा रोक दी, क्या उसी तरह मंदिर से आती घंटियों तथा आरती की आवाज सुनकर अजान रोकी जा सकती है? अगर नहीं तो आपने व्यासपीठ पर बैठकर ये जुर्म क्यों किया देवी चित्रलेखा जी? आखिर आपको ये अधिकार किसने दिया कि आप अजान की आवाज सुनकर कथा को रोक दें? श्रीमद्भागवत महापुराण के कौन से अध्याय तथा श्लोक में लिखा है कि अजान की आवाज सुनकर कथा रोक दी जाये? 
मोरारी बापू जी! आपसे भी ये जानना चाहता हूँ कि श्री रामायण तथा श्रीरामचरितमानस के कौन से कांड की कौन सी चौपाई या श्लोक में लिखा है कि व्यासपीठ पर बैठकर आप अल्ला मेरे मौला मेरे तथा मौला हरि मौला जैसा गेट गाने लगें? बताइये? आपको ये अधिकार किसने दिया कि श्रीराम कथावाचक बनकर आप व्यासपीठ पर बैठें तथा फिर वहां से इस्लामाचार्य मौलाना बनकर मौला अली मौला करने लगें? चिन्मयानन्द बापू जी! आप स्वयं को श्रीमद्भागवत महापुराण कथा करने वाला आचार्य बताते हो लेकिन व्यासपीठ पर बैठकर आप है अल्लाह रसूलल्लाह करने लगते हो तथा इस्लामाचार्य मौलाना बन जाते हो. मोरारी बापू तथा चिन्मयानन्द बापू! दोनों से ही मेरा सवाल कि क्या वह किसी मस्जिद या आपकी तरह ही किसी मौलाना मौलवी आदि से कुरान की चर्चा के बीच “श्रीराम जय राम जय जय राम” या “श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा” आदि भजनों का पाठ करवा सकते हो? अगर नहीं तो आखिर क्यों आपको इस्लामचार्य मौलाना बनने की इतनी जल्दी पडी है? और अगर बनना ही है तो आचार्य की पदवी छोड़कर खुलकर इस्लामाचार्य मौलाना बन जाइये तथा अपने इस छद्म रूप को त्यागिये!
दोस्तों! श्रीमद्भागवतगीता में जगतपिता त्रिलोकीनाथ भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा है कि ज्ञानीजन, श्रेष्ठजन, विद्वजन जैसा आचरण तथा व्यवहार करते हैं, प्रजा भी उन्हीं के अनुरूप ही चलती है. अब जरा सोचिये! ये मोरारी बापू, चिन्मयानन्द बापू तथा देवी चित्रलेखा जी! ये वो लोग हैं जिन्हें समाज में अथाह सम्मान प्राप्त है, लोग इनकी बात को न सर्फ सुनते हैं बल्कि अपने जीवन में उसको उतारते भी हैं, ऐसे में जब ये लोग व्यासपीठ पर बैठकर अजान के समय कथा बंद करेंगे? मौला हरि मौला तथा अल्लाह रसूलल्ला आदि गीत जाएंगे तो श्रोताओं पर इसका असर पड़ेगा? क्या श्रोता भी अपने दैनिक जीवन में इस कार्य को करना प्रारंभ नहीं करेंगे कि फलाने शास्त्री जी ने करवाया है तो अच्छा ही होगा। तो क्या ये लोग सनातनियों को अप्रत्यक्ष तरीके से धर्मान्तरण के लिए नहीं उकसा रहे हैं? क्या ऐसा करने से इनकी कथा सुनने तथा समझने वालों का धर्मान्तरण कराने में सनातन विरोधी ताकतों को आसनी नहीं होगी।
ऐसे समय में जब दुनिया में सनातन का भगवा ध्वज एक बार पुनः लहराता हुआ नजर आ रहा है, सनातनी संस्कृति के शंखनाद की ध्वनि को दुनिया गौर से सुनने लगी है, हिंदुस्तान अब डरकर नहीं बल्कि दुनिया की आँख में आँख डालकर बात करने लगा है तथा विश्वगुरु की अपनी पुरानी पदवी हासिल करने को पुनः संकल्पित होकर एक साथ आगे बढ़ रहा है, ऐसे में व्यासपीठ पर बैठकर मोरारी बापू, चिन्मयानन्द बापू तथा देवी चित्रलेखा जी जैसे कथावाचकों का इस्लामचार्य बन जाना क्या हिन्दू तथा हिन्दुस्तानियों के लिए विष का कार्य नहीं करेगा? अगर आप भी मानते हो कि हाँ ये सब सनातन के लिए विषबेल साबित होगा तो आज ही नहीं बल्कि अभी से इसका विरोध जताना शुरू कर दीजिये। मेरे या अपने लिए नहीं बल्कि सनातन की गौरवशाली संस्कृति की रक्षा के लिए ऐसा कीजिये तथा जरूर कीजिये। मैं यहां पर न नमाज या अजान की खिलाफत कर रहा हूँ और न ही अल्लाह या मौला वाले गीत और संगीत की बल्कि मैं अपने इन कथावाचकों का विरोध कर रहा हूँ जो व्यासपीठ पर बैठकर उसकी मर्यादा के विपरीत आचरण तथा व्यवहार कर रहे हैं. मैं इस्लामिक जानकारों तथा अनुयाइयों को सैल्यूट करता हूँ जो  स्थिति  दीनी-मजहब  विपरीत कुछ करना या कहना तो दूर, सोच भी नहीं सकते हैं.
दोस्तों! मैं यहां पर व्यासपीठ का किरोध का विरोध करने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि व्यासपीठ को सनातन का वो गौरव है जहाँ हर सनातनी श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है, व्यास पीठ पर बैठने वाले आचार्य को ईश्वर का प्रतिबिंब माना जाता है लेकिन जब इस पावन और पूज्य व्यासपीठ पर बैठने वाले हमारे आचार्य अगर इस्लामचार्य बन जाएँ तो उनका विरोध अवश्यंभावी हो जाता है. मैं व्यक्तिगत तौर पर मोरारी बापू, देवी चित्रलेखा जी, चिन्मयानन्द बापू जी या अन्य कोई भी धर्मोपदेशक या कथावाचक हो, सभी का सम्मान करता हूँ, यही कारण है कि जब मैंने वीडियोस देखे तो मुझे दुःख हुआ, मेरे ह्रदय को पीड़ा हुई और मैंने  की उस आवाज को अपनी आवाज देने का फैसला लिया है, जो आवाज व्यासपीठ पर बैठे इन लोगों द्वारा किये जा रहे कार्यों की खिलाफत कर रही है.
दोस्तों! मुगलों से लेकर अंगरेजी शासन तक, सनातन का काफी पराभव हुआ है. सनातन का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका है. अब दुनिया में एकमात्र हिंदुस्तान ही ऐसी जगह बची है जिसे हिन्दू समाज कह सकता है कि ये पावन भूमि हमारी है. तो यही समझिये कि व्यासपीठ पर बैठे इन कथित इस्लामचार्यों को अगर आप रोक सके तो आप न सिर्फ सनातनी संस्कृति को छीड़ होने से रोक पाएंगे बल्कि पावन भारतवर्ष को विधर्मी ताकतों से मुक्त भी रख पाएंगे। लेकिन अगर व्यासपीठ पर बैठे कथावाचक रूपी इस्लामचार्य मौलानाओं को नहीं रोका गया तो ध्यान रखना कि अपनी संस्कृति तथा राष्ट्र के पतन को होते हुए आप स्वयं देखेंगे और तब आपके पास इसे रोकने की सामर्थ्य भी नहीं बचेगी। लेकिन अभी आपके पास मौक़ा है कि पूज्य श्रीमद्भागवत महापुराण तथा श्रीराम कथा के जागरूक श्रोता होने के नाते ये आपका कर्तव्य भी है कि राह भटक चुके देवी चित्रलेखा, मोरारी बापू तथा चिन्मयानंद बापू जैसे कथावाचकों का विरोध इन्हें इनकी गलती का एहसास कराएं, व भूल सुधार करने को मजबूर करें। और अगर ये ऐसा नहीं करते हैं तो इनका बहिष्कार करें.

— अभय प्रताप सिंह

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