अपनी धुन में मस्त रहे स्वघोषित बहादुर नेहरू जी और चीन के कब्जा लिया था अक्साई चिन

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लद्दाख की गलवान घाटी में भारत व चीन की सेनाओं के बीच लंबे समय से जबरदस्त तनाव का माहौल है. 15-16 जून की रात ये तनाव ये तनाव चरम पर पहुँच गया तथा भारतीय सेना व चीनी सेना के बीच हिंसका टकराव हो गया. अपनी धूर्तता दिखाते हुए चीनी सेना एक बार फिर से धोखा देते हुए भारतीय सेना पर पीछे से वार कर भयानक हमला कर दिया। इस दौरान २० भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हो गए. संख्या में चीन से करीब 5 गुना कम भारतीय जवानों ने इसके बाद भी धैर्य नहीं खोया तथा चीन पर करारा पलटवार किया. हिन्द के जवानों ने अद्भुत शौर्य, साहस, वीरता व पराक्रम का नमून पेश करते हुए 43 से ज्यादा चाइनीज सैनिकों को घायल कर दिया. इस दौरान बड़ी संख्या में चाइनीज सैनिक घायल भी हुए हैं.
भारत तथा चीन के बीच चल रहे तनाव के बीच ये जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर भारत व चीन के बीच तनाव की मुख्य जड़ क्या है? आखिर चीन अक्सर भारत को घुड़की क्यों देता रहता है? ऐसे तमाम सवाल 1962 भारत चीन युद्ध के समय से ही उठते रहे हैं. अगर आप इन सवालों की तह में जाएंगे तो पाएंगे कि इसका जिम्मेदार कोई और नहीं हैं बल्कि आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू हैं जिन्हें भारत की स्वतंत्रता का ठेकेदार बताया जाता है, आधुनिक भारत का निर्माता कहा है, नेहरू ने ऐसे आधुनिक भारत का निर्माण किया कि उनके देहावसान के करीब 45 साल बाद भी भारत उनकी नीतियों व् अदूरदर्शिता का दंड झेल रहा है.
आपको बता दें कि आज जिस जगह चीनी सैनिक बैठे हैं वो अक्साई चिन भारत का था. भारत के इस हिस्से पर नेहरू के शासन काल में चीन ने कब्जा कर लिया. सवाल ये है कि अक्साई चिन को भारत ने कैसे खो दिया? उसके लिए कौन जिम्मेदार है और कैसे हम इसे दोबारा हासिल कर सकते हैं? चीन बार बार हमारी सीमा में घुसता है, भारत को उकसाता है तो क्या इन सारे सवालों का संबंध अक्साई चिन को लेकर उसकी असुरक्षा से जुड़ा है? सवाल ये भी है कि जम्मू कश्मीर पर मोदी सरकार की आक्रामक नीति का गलवान घाटी में चीन की घुसपैठ से क्या रिश्ता है? अगर है तो वो रिश्ता क्या है?
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि अक्साई चिन पर चीन ने कैसे कब्जा किया? इस दौरान भारत क्या कर रहा था? भारत ने इसे वापस पाने के लिए क्या किया और क्या इसे दोबारा हासिल किया जा सकता है? अक्साई चिन को वापस पाने का फॉर्मूला क्या है ये समझें उससे पहले हमने अक्साई चिन को कैसे खो दिया, इसकी कहानी जान लेना बहुत जरूरी है. जो तिब्बत के पठार का दक्षिण पश्चिम हिस्सा है, यहां बंजर और निर्जन मैदान हैं जिसे चीन अपने मुस्लिम बहुल राज्य शिजियांग पूर्वी तुर्किस्तान का हिस्सा बताता है, लेकिन सच ये नहीं है.
दरअसल भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू चीन को लेकर हमेशा से नरम रहे. इतिहास में लिखा है कि चीन में कम्यूनिस्ट पार्टी की सत्ता आने के बाद नेहरू ने अपने राजदूत को माओ से मिलने भेजा. ये राजदूत वास्तव में एक कथित इतिहासकार थे, प्रख्यात इतिहासविद् केएम पणिक्कर. वे इस भावना के साथ माओ से मिलने पहुंचे कि प्रधानमंत्री चीन के साथ अच्छे रिश्ते बरक़रार रखने के लिए बेताब हैं. लिहाज़ा, उन्होंने माओ से मिलने के बाद जो रिपोर्ट नेहरू को सौंपी, वो कुछ इस तरह से थी :
“मिस्टर चेयरमैन का चेहरा बहुत कृपालु है और उनकी आंखों से तो जैसे उदारता टपकती है. उनके हावभाव कोमलतापूर्ण हैं. उनका नज़रिया फ़िलॉस्फ़रों वाला है और उनकी छोटी-छोटी आंखें स्वप्न‍िल-सी जान पड़ती हैं. चीन का यह लीडर जाने कितने संघर्षों में तपकर यहां तक पहुंचा है, फिर भी उनके भीतर किसी तरह का रूखापन नहीं है. प्रधानमंत्री महोदय, मुझे तो उनको देखकर आपकी याद आई! वे भी आप ही की तरह गहरे अर्थों में “मानवतावादी” हैं!” मनुष्यता के इतिहास के सबसे दुर्दांत तानाशाहों में से माओत्से तुंग के बारे में यह निहायत ही हास्यास्पद और झूठी रिपोर्ट पणिक्कर महोदय द्वारा नेहरू बहादुर को सौंपी जा रही थी! ये सुनकर नेहरू बहादुर मुतमुईन हो गए! इसके महज़ एक साल बाद चीन ने तिब्बत पर चढ़ाई कर दी और कब्ज़ा कर लिया.
तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के ग़ुस्से का कोई ठिकाना नहीं था और उन्होंने प्रधानमंत्री को जाकर बताया कि चीन ने आपके राजदूत को बहुत अच्छी तरह से मूर्ख बनाया है. उन्होंने यह भी कहा कि चीन अब पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गया है और उससे सावधान रहने की ज़रूरत है. नेहरू ने पटेल को पत्र लिखा और कहा, “तिब्बत के साथ चीन ने जो किया, वह ग़लत था, लेकिन हमें डरने की ज़रूरत नहीं. आख़िर हिमालय पर्वत स्वयं हमारी रक्षा कर रहा है. चीन कहां हिमालय की वादियों में भटकने के लिए आएगा!”
यह अक्टूबर 1950 की बात है। दिसंबर आते-आते सरदार पटेल चल बसे. अब नेहरू को मनमानी करने से रोकने वाला कोई नहीं था. भारत और चीन की मीलों लंबी सीमाएं अभी तक अनिर्धारित थीं और किसी भी समय टकराव का कारण बन सकती थीं, ख़ासतौर पर चीन के मिजाज़ को देखते हुए. 1952 की गर्मियों में भारत सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल बीजिंग पहुंचा। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कौन कर रहा था? प्रधानमंत्री नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित!
अब विजयलक्ष्मी पंडित ने नेहरू को चिट्ठी लिखकर माओ के गुण गाए। उन्होंने कहा, “मिस्टर चेयरमैन का हास्यबोध कमाल का है और उनकी लोकप्रियता देखकर तो मुझे महात्मा गांधी की याद आई!” उन्होंने चाऊ एन लाई की भी तारीफ़ों के पुल बांधे। नेहरू बहादुर फिर से मुतमईन हो गए. इसके बाद नेहरू ने अब तक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल की. 1954 में नेहरू के नेतृत्व वाली भारत ने अधिकृत रूप से मान लिया कि तिब्बत चीन का हिस्सा है और चीन के सा‍थ “पंचशील” समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए।
लेकिन नेहरू के आत्मघाती तरक़श में केएम पणिक्कर और विजयलक्ष्मी पंडित ही नहीं थे. नेहरू के तरक़श में वी कृष्णा मेनन भी थे. भारत के रक्षामंत्री, जिनका अंतरराष्ट्रीय समुदाय में ख़ूब मज़ाक़ उड़ाया जाता था और जो एक बार “टाइम” मैग्ज़ीन के कवर पर संपेरे के रूप में भी चित्र‍ित किए जा चुके थे। भारत में भी उन्हें कोई पसंद नहीं करता था। लेकिन, जैसा कि स्वीडन के तत्कालीन राजदूत अल्वा मिर्डल ने चुटकी लेते हुए कहा था, “वीके कृष्णा मेनन केवल इसीलिए प्रधानमंत्री नेहरू के चहेते थे, क्योंकि एक वे ही थे, जिनसे प्रधानमंत्री कार्ल मार्क्स और चार्ल्स डिकेंस के बारे में बतिया सकते थे!”
ये मैं स्वयं नहीं कह रहा हूँ बल्कि ये सारी बातें इतिहास में अंकित हैं. उस समय  “साउथ ब्लॉक” में एक सर गिरिजा शंकर वाजपेयी हुआ करते थे, जो प्रधानमंत्री नेहरू को लगातार आगाह करते रहे कि चीन से चौकस रहने की ज़रूरत है, लेकिन नेहरू  को लगता था कि सब ठीक है. वो “हिंदी चीनी भाई भाई” के नारे बुलंद करने के दिन थे. इसके बाद 1956 में चीन ने “अक्साई चीन” में सड़कें बनवाना शुरू कर दीं, लेकिन आधुनिक भारत के स्वघोषित निर्माता नेहरू के कान पर जूं नहीं रेंगी। अक्साई चिन को 1842 में ब्रिटेन ने जम्मू-कश्मीर का हिस्सा घोषित किया था। अब यहाँ पर बनी चीनी सड़क का एक ही मतलब था कि चीन अब भारत के इलाके से होकर तिब्बत तक जा सकता था. भारत-चीन के बीच जो “मैकमोहन” रेखा थी, उसे अंग्रेज़ इसलिए खींच गए थे ताकि असम के बाग़ानों को चीन ना हड़प ले, लेकिन “अक्साई चीन” को लेकर वैसी कोई सतर्कता भारत ने नहीं दिखाई.
1958 में चीन ने अपना जो नक़्शा जारी किया, उसमें “अक्साई चीन” में जहां-जहां उसने सड़कें बनवाई थीं, उस हिस्से को अपना बता दिया. 1959 में भारत ने दलाई लामा को अपने यहां शरण दी तो माओत्से तुंग ग़ुस्से से तमतमा उठा और उसने भारत की हरकतों पर कड़ी निगरानी रखने का हुक्म दे दिया. 1960 में चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई हिंदुस्तान आए और नेहरू उनसे ऐसे गर्मजोशी से मिले, जैसे कोई बात ही ना हो. आज इंटरनेट पर चाऊ की यात्रा के फ़ुटेज उपलब्ध हैं, जिनमें हम इस यात्रा के विरोध में प्रदर्शन करने वालों को हाथों में यह तख़्‍ति‍यां लिख देख सकते हैं कि “चीन से ख़बरदार!” ऐसा लग रहा था कि जो बात अवाम को मालूम थी, उससे मुल्क के वज़ीरे-आज़म ही बेख़बर थे!
1961 में भारत की फ़ौज ने कुछ इस अंदाज़ में “फ़ॉरवर्ड पॉलिसी” अपनाई, मानो रक्षामंत्री मेनन को हालात की संजीदगी का रत्तीभर भी अंदाज़ा ना हो. इस पॉलिसी में कहा गया कि भारत को एक-एक इंच चीन की ओर बढ़ना चाहिए। जबकि वास्तव में जमीनी हकीकत यह थी कि यह ‘बैकवर्ड पॉलिसी’ बन गई. चीनी सेना लगातार भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ करती चली गई और हम लगातार पीछे हटते चले गए। कुछ माह में ही मानो नेहरू नींद से जागे और संसद में प्रस्ताव रखते हुए चीन के धोखे की बात का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उन्हें दुनिया समझ में आ गई. जवाहरलाल नेहरू ने कहा, “हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे.”
इसके बाद चीन ने हिंदुस्तान पर ज़ोरदार हमला बोला. नेहरू बहादुर हक्के बक्के रह गए. “हिंदी चीनी भाई भाई” के शगूफ़े की हवा निकल गई। पंचशील “पंक्चर” हो गया. भारत को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. चीन ने अक्साई चीन में अपना झंडा गाड़ दिया तथा भारत की करीब 37 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक जमीन पर कब्जा कर लिया. चीनी सैनिकों को जिस अवसर की तलाश थी वह उन्हें मिला. नेहरू का ‘पंचशील’ और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे भारत की हार के रूप में सामने आए.
आश्चर्य देखिये, उन्हीं नेहरू को भारत में बहादुर कहा जाता है, आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है. उन्हीं बहादुर नेहरू की पोलिटिकल, कल्चरल और डिप्लोमैटिक लेगसी में जितने भी छेद हैं, यह उनकी एक तस्वीर मात्र है. ऐसे ही छेद कश्मीर, पाकिस्तान, सुरक्षा परिषद, कॉमन सिविल कोड, महालनोबिस मॉडल, फ़ेबियन समाजवाद, रूस से दोस्ती और अमरीका से दूरी, आदि अनेक मामलों से संबंधित नेहरू नीतियों में आपको मिलेंगे. नेहरू अपनी आत्ममुग्धता, लापरवाही तथा अदूरदर्शिता के कारण आज तक इस युद्ध का फैसला अधूरा छोड़कर गए. आज चीन के सैनिक एक बार फिर सीमाओं पर डटे हैं, तनाव का माहौल है. हालाँकि इस बार चीन के सामने नेहरू नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी हैं, जिन्होंने 2014 में अपने पहले कार्यकाल की शपथ लेते हुए खुद को देश का प्रधानसेवक कहा था तथा एलान किया था कि “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूंगा”.
यही कारण है कि जब लद्दाख की गलवान घाटी में 43 चीनियों को मारकर भारत के 20 सैनिकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया है. वो नेहरू जी ने जिन्होंने 37 हजार वर्ग किलोमीटर भारत की जमीन चीन को सौंप दी थी लेकिन मोदी सरकार में हिन्द के जवान भारत की 1-1 इंच जमीन के लिए न सिर्फ चीन से जूझ रहे हैं बल्कि चीन को पटखनी भी दे रहे है. फिर भी, चीन के कम्युनिस्ट रवैए के प्रति किसी भी प्रकार की आशा खुद को धोखे में रखना ही होगा। वीडियो के अंत में गलवान घाटी में भारतमाता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले हिन्द के जवानों के चरणों में सर झुकाते हुए उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी तथा भारतीय सेना ने कहा है कि बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा तथा भारत अपनी एकता, अखंडता व संप्रुभता से बिलकुल भी समझौता नहीं करेगा। हम शांति के पक्षधर हैं लेकिन भारत की सीमाओं की तरफ बुरी नजर रखने वाले हर दुश्मन को घर में घुसकर मारने का माद्दा भी रखते हैं. जय हिन्द

— अभय प्रताप सिंह

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