स्त्री-लेखन में मुखर उनके अधिकार -सविता पांडेय

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मुट्ठी भर आसमान और सीमाबद्ध धरती का अक्स समेटे भारतीय स्त्री ने आंगन की भीतियों को लाल गेरू से पोतकर उस पर बड़ा-सा ’स’ लिख दिया।

यह साहित्य का ’स’ था। एक खूबसूरत ’स’ जो स्त्री-चेतना को गुनगुनी धूप में सेंक सकता था। और उनकी मुट्ठी में सितारे भर सकता था। यह ’स’ अद्भुत रूमानियत, शान्ति, रहस्यों और पवित्रता से भरा था। साहित्य के ’स’ ने स्त्री के ’स्’ के साथ सामंजस्य बिठाया और स्त्रीत्व की नई परिभाषा रच डाली।
देवी, माँ, बहन, बेटी, प्रेयसी, पत्नी, कुटनी, पतिता की आक्रांत छवियों से भयभीत नारी ने नये आयाम और संभावनायें खोज निकालीं।
दया, करुणा , प्रेम, सौंदर्य, कोमलता, विश्वास और ईश्वरीय शक्ति होने की जड़ता से परे स्त्री-मन को सारे उद्वेगों, द्वंद्व और तनाव को बिला देने वाला वह तार चाहिये था, जो मन-से-मन का संवाद स्थापित कर सके। उसके सुंदर सपनों की सबसे लुभावनी वस्तु ’घर’ और उसकी परिधि के बाहर आने वाले कुल, कुटुम्ब, परिवार, कबीले, कस्बे में उसके अनिश्चित, मुश्किल और आशंकित जीवन को इबारत का स्वर चाहिये था। ये स्वर और सपने समकालीन स्त्री लेखन में गहराई से प्रतिध्वनित होते हैं।
उसने रोजमर्रा की बाधा दौड़ों के बीच जीना और लिखना सीख लिया । लेखन ने स्त्री को नई ऊर्जा, अभिव्यक्ति, कीर्ति और आत्मनिर्भरता दी। आत्मिक निर्भरता। स्वप्न। अब कोरे कागज वह मोर्चा बन गये जहाँ वह अपनी हर बात लिख सकती थी और हर लड़ाई लिखकर जीत सकती थी। उसकी लेखनी पुराने अर्थों, संदर्भों, पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ने के सफलतम प्रयास करती रही। आजादी की सदी से अधिक समय और उसके पूर्व महिला-लेखिकाओं ने न सिर्फ शारीरिक, आर्थिक और परिवारिक शोषणों को उल्लिखित कर कलम उठाने का साहस किया बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक -वैचारिक , आर्थिक समकालीन मुद्दों पर भी खूब लिखा।
यह समस्त विश्व की बानगी है। संपूर्ण विश्व में जन्म लेने वाली चेतना की महागाथा। स्त्रीगाथा। अभिव्यक्ति की इस उड़ान और स्वतंत्रता ने तमाम भाषाओं और अलग-अलग काल-खंडों में स्त्री स्वर को गरिमा दी है। स्त्री-मुक्ति भले ही अभी एक ’नारा’ बनकर रह गया हो लकिन सृजन और विचार की दुनिया में महिलाओं की उपस्थिति ने स्थापित दृष्टिकोणों को बदला ही है। चाहे यूरोपियन साहित्य हो या अन्य विदेशी भाषायें सबमें स्त्रियों की अभिव्यक्ति के समान रंग मुखरित हैं। अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में मेरी वुलस्टोनक्राफ्ट अपनी पुस्तक ’विंडिकेशन’ में स्त्री शिक्षा और अधिकारों की आवाज पुष्ट करती हैं, जो स्त्रियों को उनकी पहचान, आजादी और समानता दिला सके। महिलाओं की आर्थिक-समाजिक और कलात्मक आवश्यकताओं के स्वर वर्जिनिया वुल्फ मुखर करती हैं तो वही फ्रांस की प्रसिद्ध लेखिका सिमोन द बोउवार स्त्री को पुरुष का दूसरा भाग संबोधित कर अपनी पुस्तक ’द सेकेण्ड़ सेक्स’ में तमाम कोणों से स्त्री शक्ति की भूमिका और उसे सेकेण्ड्री बनाने के उपक्रमों पर प्रकाश डालते हुए कहती हैं कि “स्त्री पैदा नही होती, बना दी जाती है“। एलिन सोवाल्टर ’ गायनोक्रिटिक्स’ थ्योरी उद्धृत कर स्त्री जाति की शारीरिक, मानसिक, भाषायी और सांस्कृतिक अवयवों की सुंदर व्याख्या करती हैं तो सिल्विया प्लैथ पितृसत्ता को न सिर्फ एक क्रूर संचालक बल्कि बर्बादी और विनाश की ओर धकेलने वाला बल कहती हैं। शिम्बोस्का, क्लाश, जेटकिन जैसी लेखिकाओं विदेशी साहित्य में स्त्रीवादी सिद्धांत की एक अनुशासन के रूप में पूरी तरह से परिपक्व और बहुआयामी अस्तित्व की व्याख्या करती हैं। जॉर्ज एलियट और इसाक डेनिसन छद्म पुरूष नामों से लिखने का दबाव झेलती दिखती हैं जो अपने को महिलापने से अलग करके एक लेखिका के रूप में प्रमाणित कर सकें।
विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी वरिष्ठ पीढ़ी के साथ नई युवतर पीढ़ी भी सक्रिय है। महाश्वेता देवी, मयनामती (बंगाली); प्रतिभा राय, कुकुन्तला कुमारी देवी (उड़िया); अमृता प्रीतम (पंजाबी); लल्ला देवी, बेगम हव्वा खातून, पंडितानी अरनिमाल (कश्मीरी); श्रीमती लीलावती मुंशी (गुजराती) ; दासी जनाबाई, लक्ष्मीबाई तिलक (मराठी); औवैयार, आंडल (तमिल) नालपट्टू बालामणिअम्मा, ललिताम्बिंका (मलायलम) आदि विभिन्न बोलियों- भाषाओं की लेखिकाओं के लेखन में रचनात्मक स्वर हैं जो सिर्फ ’महिला- लेखन’ तक सिमटे नहीं रह सकते। वे मनुष्यता बनाये और बचाये रखने के स्वर हैं जो किसी प्रकार के रचनात्मक आरक्षण की दरकार नहीं रखते। महिला-लेखन की संपूर्णता का प्रतिबिंब वैदिक साहित्य, संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य अप्रभंष साहित्य तक में दिखता है। रोमषा लोपामुद्रा, श्रद्वा, कामायनी, यमी, वैवस्ती, पालोमी, शची, विष्वधारा, अपाला, ममता, वाक्, अदिति, शाष्वती, आत्रेयी, ब्रम्हवादिनी घोषा इत्यादि ऋषिकाओं द्वारा रचित साहित्य तत्कालीन लोकजीवन की प्रतिबिंब है । लोक साहित्य और लोकगीतों से झाकती नारी मन की विभिन्न अभिव्यक्तियां लोक-चेतना और मनोवृतियों के अंतरावलंबित स्वरूप को तो दर्शाती ही हैं।
हिन्दी स्त्री-लेखन में महादेवी वर्मा, मैत्रयी पुुषपा से लगायत गीताश्री, जयश्री
राय, नीलाक्षी सिंह, प्रत्यक्षा आदि अनेकों लेखन में स्त्री से जुड़े सवाल उठीते और औपचारिक स्वीकृति पाते रहे। दर्शन , इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र , समाजशास्त्र , यौनविज्ञान , कानून, मनोविष्लेषण, फिल्म और कला के क्षेत्रों में ज्ञानक्षेत्र का स्त्रीवादी संस्करण साहित्य के माध्यम से मुखरित हुआ है। प्रभा खेतान के ‘अन्या से अनन्या’ (आत्मकथा ) लिखने के साहस को नारी-विमर्श की ’स्वतंत्रता’ की तरह देखा जाना चाहिये।
कृष्णा सोबती की ’मित्रो मरजानी’, मृदुला गर्ग का ’ चितकोबरा’, मन्नू भंडारी का आपका बंटी, ’महाभोज’, इसमत चुगताई की ’लिहाफ’, लवलीन का ’चक्रवात’, मैत्रेयी पुष्पा का ’गुड़िया भीतर गुड़िया’ जैसी ढेरों कृतियां विभिन्न आयामों को छूते साहित्य का उदाहरण भर नहीं स्त्री की नई परिभाषा है जो उसे पुरुष की अंकशायनी बने रहने भर से इतर करता है।
सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, अमृता भारती, महाश्वेता देवी जैसी लेखिकाओं ने हर तरह के समाजिक और रचनात्मक आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भागीदारी की और जोखिम उठाये। अन्नपूर्णा देवी, उषा देवी मित्रा, चंद्रकिरण सौनरेक्सा, शिवरानी देवी, कौशल्या अश्क स्वतंत्रता पूर्व के आरंभिक दौर में कठिन समय की लेखिकाएं रहीं। जिन्होंने अपनी मूक अभिव्यक्तियों को कलम की धार संग बहने देने का कठिन सहास किया। सतीत्व, पत्नीत्व, मातृत्व जैसे विषयों संग नारी चेतना के आत्मबोध और संघर्षरत छवियों को चित्रित किया। उनकी रचनाओं ने निश्चय ही स्त्री की परजीविता और मूल्यों की वकालत की है। अलका सरागवी, गगन गिल, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मृदुला गर्ग, मेहरून्निसा परवेज, कुसुम अंचल, मंजुल भगत आदि की कृतियां आत्म विद्रोह, जीवन मूल्यों के पुनर्स्थापन और समन्वयन, परिवर्तन, चुनौतीपूर्ण दात्विबोध जैसे विषयों से पटी हैं और नये मानव मूल्य गढ़ती हैं जो पारंपरिक मूल्यों के तिलिस्मी रहस्य को तोड़कर उपजी हैं। आज का समय महिलाओं के उत्थान के चारों ओर घुम रहा है और समस्त विश्व में एक अलग तरह की संधर्षचेतना एक साथ पनप रही है। निश्चय ही भारतीय परिवेश में भी यह चेतना समा रही है और महिला साक्षरता वृद्धि , महिलाओं संबंघी कानूनों, मीडिया, स्त्री-पुरुष संबंधों पर इसका व्यापक असर पड़ा है। इन बदलते इुए कानूनों, शिक्षा व्यवस्था मीडिया के प्रभावों और नारीवादी आदोलनों ने लेखिकाओं केा आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता से लबरेज किया ही है उनके लिखने का तेवर भी बदला है। व्यक्तिगत ’स्पेस’ की अवधारणा को नया प्रारूप मिला है जिसने पारंपरिक ढ़ांचें को हिलाकर रख दिया है। पुरुष सत्ता के वर्चस्ववादी मूल्यांे को इससे झटका लगा है। मूल्यों के खांचे टूट से गये हैं। गजब का राजनैतिक और वैचारिक लेखन समाज को केंद्र में रखकर हुआ है।
लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि महिलाओं के लेखन को ’महिला-लेखन’ के साँचे में सेट कर दिया गया है। अपने लिखे को महिलापने से अलग रखने का दबाव लेखिकाओं पर बना ही रहता है । लेखन में नारीवाददर्शन की तहकीकात और शोध तो होना ही चाहिये। लेकिन ’महिला लेखन’ के पुर्वाग्रह से आसक्त हुये बिना। समय कब का आ चुका है कि महिला लेखन की अलग से इकहरी तस्वीर खिंचनी बंद की जाये और महिलालेखन के इकहरे ढांचे को तोड़ दिया जाये जो साहित्य से लचीलापन और विविधता छीन लेता है। महिला लेखन को ’घर’ की दीवारों और छप्परों के साथ जोड़ दिया गया है। दांपत्य जीवन के संदर्भ विवाहेत्तर संबंध, पारिवारिक मूल्य निज स्वंतत्रता, नीति-अनीति जैसे विषयों को अगर महिलाओं ने देखा, समझा और रचा है तो यह ’घर’ के दायरे में रहकर तीव्र, गहन अनुभूतियों को कलमबद्व करना ही है ’घर’ स्त्री-पुरूष का सम्मिलित ठिया है। एक लेखक विशुद्ध रचनाकार होता है। महिला – पुरुष नहीं। अनुभूति, अभिव्यक्ति, स्वानुभवों और आत्मचेतना की अभिव्यक्ति को बांटना कितना सही है ?
महिलाओं के लेखन और सोच में प्रखरता, परिपक्वता और नई भंगिमा ने नये धरातल का निर्माण किया है। इस डगमगाते धरातल के संरक्षण के लिये नये कानून और अधिकार बने तो हैं लेकिन साहित्य की तरह ही आम महिला वर्ग का प्राय उसे नहीं दिला सके हैं। नारी लेखन समस्त स्त्री जाति के मौन शब्द हैं। स्त्री ने स्त्री की दबी घुटी पीड़ा को अभिव्यक्त किया है। चाहे वह पीड़ा और मुखालफत तसलीमा नसरीन के जन धर्मी -जीवनधर्मी साहित्य में या अरुंधति राय के ’खतरनाक’ लेखन में व्यक्त हुआ हो या बहुत ही शांत चित्र आक्रोश के साथ ’एक कहानी यह भी’ में। लेखिकाओं ने अन्य स्त्रीयों को उनके अधिकारों और मूल्यो के प्रति सचेत किया है। लेकिन जिनके लिये नारी चेतना को झकझोरता लेखन किया जाता है उनतक पहुँचता ही नहीं। दरअसल यह कमी सिर्फ महिला लेखन संदर्भ में नहीं समूचे हिन्दी साहित्य की दुखभरी बानगी है। कथा लेखन के क्षेत्र में लेख्किाओं की कमी और समाज से दूरी सालती जरूर है। जहाँ महिलाओं की जनसंख्या प्रतिशत ही कम हो वहाँ लेखन के क्षेत्र में कमी स्वाभाविक ही है। इसी क्रम में पाठकों और प्रशंसकों में भी पुरुष ही अधिक हैं। फिर भी संभावनाओं की धरती हरियाती जा रही है। नये परिवेश में नयी प्रतिभायें न सिर्फ अंकुरित हो रही हैं, उनसे संुदर फूल और मीठे फल भी मिल रहे है। सृजनात्मक दुनिया विस्तारित हुई है।
’मेरी देह वापस करो’ तो ठीक है लेकिन स्त्री लेखन को यह भी सावधानी तो बरतनी ही है कि ’दलित-विमर्श’ की तरह ’शेष समाज’ को दुश्मन न मान लिया जाये या स्त्री अधिकारों की बात करते – करते पूरे पुरुष समाज को ही प्रतिद्वंदी न मान लिया जाये। स्त्री लेखन को देह- विमर्श बनाने से बचना होगा। देह ओर देह के पार खुले आकाश को घर बनाना होगा। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह स्त्रियों में कीर्ति , श्री , वाक् , स्मृति , मेधा , धृति और क्षमा के रूप में विराजते हैं। इसलिए स्त्री मुक्ति भारतीय रास्ता यही हो सकता है कि सप्त शक्तियां फूल सकें और खिल सकें। स्त्री मुक्ति एक विचार , शक्ति है। इसलिए नारी मुक्ति को भारतीय रास्ता देने की जरूरत है।
स्त्री लेखन को जीवन के अनेक रंग अभी रचने हैं। जीवन को सुंदर बनाना है। व्यापक भी!

नोट- लेखिका प्रसिद्ध साहित्यकार है

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