सोनू सूद! फ़िल्मी दुनिया का खलनायक, हकीकत में निकला महानायक … जिन्हें पूरा देश कर रहा है सैल्यूट

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वैश्विक महामारी कोरोनावायरस का कहर लगातार बढ़ता ही जा रहा है. देशव्यापी लॉकडाउन के कारण देश के विभिन्न महानगरों से बड़ी संख्या में मजदूर लोग अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं. अगर कुछ साधन मिल रहा है तो ठीक वरना पैदल ही घर की ओर निकल पड़े हैं. हालाँकि अब कई राज्यों की सरकारें मजदूरों को सुरक्षित घर पहुंचाने की दिशा में कदम उठा रही हैं लेकिन कई जगह या तो ऐसे प्रयास असफल हो रहे है या फिर शासन तथा प्रशानिक स्तर पर उचित प्रयास किये ही नहीं जा रहे हैं.

पैदल चलते राष्ट्र निर्माणी मजदूरों के इसी दर्द को जब बॉलीवुड के अभिनेता सोनू सूद ने देखा तो उन्होंने वो कदम उठाया कि आज देश के हर व्यक्ति की जुबान पर सोनू सूद का ही नाम है. वही सोनू सूद जो फ़िल्मी दुनिया का तो खलनायक है लेकिन असल जिंदगी में वह महानायक बनकर सामने आये हैं. फिल्मों में विलेन का रोल निभाने वाले सोनू सूद देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई से उत्तर प्रदेश, बिहार तथा विभिन्न राज्यों के अनगिनत मजदूरों को बसों से उनके घर तक पहुंचा रहे हैं. फिलहाल की स्थिति की बात की जाये तो लोगों की जुबान पर तारीफ़ के लिए एक ही नाम है तथा वो नाम है सोनू सूद.. सोनू सूद का नाम जुबा पर आते ही लोग नतमस्तक हुए जा रहे हैं.

जब देश सुचारू रूप से चल रहा था, तब सड़कें, पुल, मकान, फ्लैट्स, फैक्ट्री आदि में आपको मजदूर काम करता हुआ दिखलाई देता था. बिना रुके, देश की रफ्तार को पकड़कर दौड़ता नजर आता था. श्रमिकों द्वारा बनाई सड़के, जो लोगों से भरी दिखलाई पड़ती थी. फिर चीन से निकले कोरोना  गिरफ्त में हिंदुस्तान भी आ गया. देश के लोगों की जान बचाने के लिए लॉक डाउन किया गया. लॉकडाउन होते ही 130 करोड़ की आबादी वाला हिंदुस्तान थम सा गया. लोग घरों में बंद हो गए लेकिन सूनी सड़कों पर रह गया मजदूर … सिर्फ मजदूर।

जब कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया तो ये मजदूर पैदल ही अपने घर की ओर निकल पड़ा. सड़क पर कहीं अकेले तो कहीं परिवार के साथ पैदल चलते मजदूर के जेहन में अवश्य आया होगा कि हमने सड़के बनाई, मकान बनाए, फ्लैट्स बनाए। हमने अपने खून पसीने से इस राष्ट्र को सींचा, थकान हुई लेकिन हम रुके नहीं. लेकिन आज जब देश रुक गया तब सब लोग अपने अपने घरों में चले गए क्योंकि उनके पास घर है और वह खुद सड़क पर ठोकर खा रहा है, पैदल ही घर को जा रहा है.

मुंबई से भी बड़ी संख्या में ऐसे ही मजदूर पैदल ही अपने घरों की ओर निकल पड़े. तभी सामने आये सोनू सूद. सोनू सूद कहते हैं कि श्रमिकों के मन के भीतर बने “विश्वास” के पुल को टूटने नही देना चाहिए क्योंकि अगर यह पुल टूट गया तो इन्हें वापस लाने में दिक्कत होगी। सोनू सूद कहते हैं कि हमारी मुंबई नगरी को, हमारे हिंदुस्तान को अपने खून पसीने से सींचने वाले इन मजदूरों के इसी विश्वास को बनाये रखने के लिए लॉक डाउन में मेरी तरफ से जो गिलहरी प्रयास हो  सकता था, मैं उसे पूरा करने में जुट गया.

सोनू सूद कहते हैं कि जब मैं घर से बाहर निकला, तब कई लोगों ने टोका था. लेकिन किसी न किसी को तो शुरुआत करनी होगी. सब घर मे रहेंगे तो काम कैसे चलेगा. जरा सोचिये कि अगर कभी हम ऐसी सिचुएशन में फंस जाए तब क्या हाल होगा. मैं बहुत खुश हूं कि मेरे प्रयास से प्रवासी श्रमिकों के मन को खुशी हुई और उन्होंने मुझमें विश्वास महसूस किया, इसलिए वह लोग मुझसे मदद मांग रहे है.

एक ट्वीट आता है!   “सोनू सूद सर प्लीज़ हेल्प. ईस्ट यूपी में कहीं भी भेज दो सर। वहां से पैदल अपने गांव चले जाएंगे।’ तुरंत सोनू सूद का रिप्लाई आता है– ‘पैदल क्यों जाओगे दोस्त? नबंर भेजो।’ ‘हम प्रबन्ध करते है न’
एक और ट्वीट आता है- सर इन परिवारों को घर पहुंचाने मे मद्दत कीजिये हर जगह कोशिश की लेकिन इनको नाउम्मीदी ही हाथ लगी अब आप ही इनकी आखिरी उम्मीद है इनकी मद्दत कीजिये!  तुरंत सोनू सूद का रिप्लाई आता है— आख़री उम्मीद से कभी नाउम्मीद नहीं होंगे। घर तो घर है।
एक और ट्वीट आता है- सर यह आदमी बहुत परेशान है कुर्ला ईस्ट में रहता है अपने घर जाना चाहता है हर रोज़ किसी ना किसी थाने जाकर लाईन लगाता है लेकिन कोई सफलता नहीं मिली आप प्लीज इसकी मदद करें। ट्वीट में मोबाइल नंबर व एड्रेस भी होता है. तुरंत सोनू सूद का रिप्लाई आता है- —- उसको बोलो चक्कर लगाना बंद करे और परेशान ना हो। जाएगा अपने घर। शीघ्र
एक और ट्वीट आता है- सर हमरे ट्टवीट का भी रिप्लाइ कर दीजिए ताकि हमें भी आशा हो जाए कि हम अपने घर जा सकेंगे धन्यवाद सोनू सूद सर! सोनू सूद रिप्लाई करते हैं- आशा नहीं विश्वास रखना .. घर ज़रूर छोड़ के आऊँगा!

ऐसे एक या दो नहीं बल्कि अनगिनत ट्वीट आपको मिल जायेंगे. सोनू सूद बिहार, उत्तराखंड, यूपी, आदि के प्रवासी श्रमिको के विश्वास के पुल से, उन्हें महाराष्ट्र से उनके घर पहुँचा रहे है. इससे पूर्व सोनू सूद ने प्रवासियों के लिए परिवहन सुविधाओं के अलावा सोनू सूद ने पंजाब में स्वास्थ्यकर्मियों को 1500 से अधिक पीपीई किट भी दान किए. सूद ने अपने मुंबई के होटल को पैरामेडिक्स के आवास के लिए भी उपलब्ध कराया. और रोज श्रमिको खाना खिला रहे है. फिल्मों में सोनू सूद खलनायक बनकर सामने आते हैं लेकिन रियल लाइफ में वह नायक नहीं बल्कि महानायक बनकर सामने आये हैं.

मैं कहीं पढ़ रहा था कि सोनू सूद ने कहा है कि सक्षम तथा कामयाब होने के बाद भी अगर आप घर पर बैठकर सिर्फ शिकायत कर सकते हो इस लॉकडाउन की या इन समस्याओं की, तो इस कामयाबी का कोई मतलब नहीं है. पैदल चलते मजदूरों की बात करते हुए सोनू सूद कहते हैं कि वो बच्चा 500 किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर तो पहुंच जाएगा लेकिन कल को जब वो बड़ा होगा तो 500 किलोमीटर का ये सफर पूरी ज़िंदगी उसके जेहन में रहेगा। उस चीज़ को मिटाने के लिए या फिर उसे ये कभी याद ही न रखना पड़े, इसके लिए मैं आगे आया।”

“मुझे डर लगता है कि कहीं मैं किसी ज़रूरतमंद का ट्वीट मिस न कर दूं तो रात को भी जब दो-तीन बजे मेरी नींद खुलती है तो मैं फोन उठाकर देखता हूं कि कहीं कोई बहुत ज़रूरतमंद इंसान तो नहीं। कल हमने बहुत सारे लोग गोंडा, बस्ती, मधुबनी, सीतामढ़ी, प्रतापगढ़, बहुत जगह भेजे। उसमें से 8-10 लोग रह गए क्योंकि वो देर से पहुंचे तो रात को पौने बारह बजे हमने अरेंजमेंट किया और खुद मेरे दोस्त टैंपो चलाकर उन्हें वहां पहुंचाकर आए जहां उन्हें जाना था। हमारे परिवारवाले कहीं फंसे हों और अगर हम उनके लिए हम जितनी मेहनत करें, उतनी ही मेहनत हमें इनके लिए करनी पड़ेगी, तभी ये घर पहुंच पाएंगे।”

“मैं बसें रवाना करने से पहले बस में चढ़कर उनसे पूछता हूं, दोस्त वापस तो आओगे न? वो कहते हैं, हम पक्का वापस आएंगे। आपसे नहीं मिलते तो शायद वापस नहीं आते मगर आपने जिस प्यार से हमें भेजा है, तो अब हम वापस ज़रूर आएंगे। मैं भी कहता हूं कि वापस आकर पक्का मुझसे मिलना। जब हम इनका हाथ थामते हैं तो जो विश्वास की कड़ी है वो न सिर्फ़ इन तक बल्कि पूरे हिंदुस्तान तक पहुंचती है। इनका वापस आना बहुत ज़रूरी है क्योंकि अगर ये लोग वापस नहीं आए तो शहर भी गांव ही बन जाएंगे क्योंकि जब तक धड़कन शरीर के अंदर नहीं आएगी तो दिल धड़केगा कैसे।”

“अगर एक इंसान को मैं परमिशन लेकर बाहर भेजता हूं तो पहले तो उसका मेडिकल करवाना होता है, फिर लोकल पुलिस स्टेशन से ओके होता है, फिर वो डीसीपी ऑफिस जाता है, डीसीपी ऑफिस से उस स्टेट में डीएम के ऑफिस जाता है, जहां उस आदमी को जाना है. फिर वहां उसे डीएम साइन करता है. वहां से वो डीसीपी ऑफिस वापस आता है. वहां से वापस पुलिस स्टेशन और फिर वो ओके होता है. तब उस इंसान को बाहर ट्रैवल करने के लिए परमिशन मिलती है. तो जब ये सब लोग जिनको फ़ॉर्म भरना नहीं आता, वो कहां से ये सब प्रॉसेस करेंगे. ये बहुत लंबा प्रॉसेस है. चलो मैंने तो किया, मैं तो चलो उसको ऑर्गनाइज़ कर पाया लेकिन आम लोग इसे कैसे करेंगे.

सोनू सूद कहते हैं कि मैं ये जानता हूं कि कहना बहुत आसान है. जब आप एक सिस्टम चलाते हैं तो उसके कुछ रूल होते हैं, कुछ बाधाएं होती हैं लेकिन आपको ये समझना चाहिए कि हम जिस दौर में रह रहे हैं, जिस माहौल में रह रहे हैं, वहां पर कोई रूल्स और रेगुलेशन नहीं रहे. अगर आप इन्हें घर नहीं जाने देंगे तो या तो ये पैदल चले जाएंगे या तो ये सड़कों पर बैठ जाएंगे या ये ट्रक्स पर बैठकर चले जाएंगे ये लेकिन ये घर जाएंगे ज़रूर. तो इन्हें रोकना नहीं चाहिए घर जाने से बल्कि इन्हें मौका देना चाहिए, ताकि ये घर जा सकें. हमें इनको सुरक्षित तरीके से इनके घर तक पहुंचाने का प्रबंध करना चाहिए.

आज सोनू सूद ने अपना कद महानता से भी महान कर लिया है. मैं जिससे भी बात कर रहा हूँ वो यही कह रहा है कि सोनू सूद कोई आम इंसान नहीं है बल्कि संकट के इस समय वह गरीबों के लिए मजदूरों के लिए ईश्वर की जीवंत प्रतिमा बनकर सामने आये हैं. सोनू सूद के इन्हीं महानतम कार्यों से प्रभवित होकर किसी ने लिखा है-

किसको पता था, एक कपड़े वाला इतना सब कर जाएगा,

कैसा ये संकल्प लिया, हर शख्स अब घर जायेगा,

जिसकी रील लाइफ का मै फैन, लेकिन रियल लाइफ में दिल जीत लिया,

जो ना कर पाई सरकार, सोनू सूद ने कर दिया”

जिन मजदूरों को सोनू सूद ने उनके घरों तक पहुंचाया है, उनके मुंह से यही निकल रहा है–

“तेरा साथ है जो, मुझे क्या कमी है– अंधेरों से भी मिल रही रोशनी है” ..

मैं अभय प्रताप सिंह! महानायक सोनू सूद को प्रणाम करता हूँ. धन्य हैं वो माता-पिता जिन्होंने सोनू सूद को जन्म दिया तथा आज वही सोनू सूद पूरे देश का लाडला बन गया है. सैल्यूट सोनू भाई.. हिंदुस्तान को आप गर्व है.

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